'शांत' छत्तीसगढ़ पर NSA का पहरा: 33 कलेक्टर्स को मिली 'सुपरपावर', लेकिन सवाल वही—धान के कटोरे में अचानक क्यों तनी रासुका की नाल?
रायपुर / बिलासपुर | तीखा राजनीतिक-प्रशासनिक विश्लेषण
शांति, सौहार्द्र और सीधे-सरल मिजाज के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में गृह विभाग का एक फरमान आते ही सियासी और प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई है। राज्य सरकार ने कानून-व्यवस्था और लोक शांति का हवाला देते हुए 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर तक पूरे प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका / NSA) 1980 के तहत असाधारण शक्तियां लागू कर दी हैं। प्रदेश के सभी 33 जिलों के कलेक्टर्स को सीधे तौर पर यह ताकत सौंप दी गई है कि वे लोक व्यवस्था के लिए खतरा बनने वाले किसी भी संदिग्ध को सीधे हिरासत (डिटेन) में ले सकें।
प्रशासन इसे आगामी त्योहारों के मद्देनजर एहतियाती कदम और उपद्रवियों पर नकेल कसने की तैयारी बता रहा है, लेकिन सत्ता के इस तीखे तेवर ने सूबे की फिजा में कई असहज सवाल भी घोल दिए हैं।
जब कड़े कानून ही बन जाएं सुशासन का पैमाना
अक्सर जिन कानूनों का साया सीमांत या अशांत राज्यों में नजर आता है, उसका अचानक पूरे छत्तीसगढ़ के चौराहों पर चस्पां हो जाना हर किसी को चौंका रहा है।
* क्या सामान्य कानूनी धाराएं, नियमित पुलिसिया गश्त और खाकी की मौजूदगी अब व्यवस्था संभालने में कम पड़ रही है?
* या फिर कलेक्टर्स के हाथ में सीधे 'ब्रह्मास्त्र' थमाकर सरकार यह संकेत दे रही है कि अमन-चैन का दावा जितना कागजों पर मजबूत दिखता है, जमीन पर उतना ही नाजुक है?
त्योहारों के जिस मौसम में गलियों में ढोल-नगाड़ों और उत्सव का उल्लास होना चाहिए, वहां 3 महीने के लिए रासुका का खौफनाक पहरा खड़ा करना यह सोचने पर मजबूर करता है कि यह व्यवस्था को साधने की कवायद है या फिर किसी भी संभावित विरोध को समय से पहले ही 'नजरबंद' कर देने की प्रशासनिक तैयारी।
आशंकाओं की ढाल या प्रशासनिक घबराहट?

बलौदाबाजार की आगजनी की तपिश हो या अंदरूनी इलाकों में सुलगते जमीनी मुद्दे, सड़क पर उतरते कर्मचारी हों या युवा—सवाल उठता है कि क्या हुकूमत जन-संवाद के बजाय असाधारण कानूनों की ओट तलाश रही है?
जब अपने ही सूबे में शांति बनाए रखने के लिए हर थोड़े दिन में ऐसे भारी-भरकम फरमानों की दरकार पड़ने लगे, तो साफ है कि स्थिति उतनी सहज नहीं जितनी बयानों में पेश की जाती है। 33 जिलों के कलेक्टर्स को मिली असीमित शक्तियों के बीच आम जनता अब हैरानी से देख रही है कि जिस 'धान के कटोरे' की तासीर में ही शांति घुली थी, वहां कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए साधारण पहरे से काम नहीं चला, सीधे रासुका की नाल ताननी पड़ गई।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
हमर प्रदेश सी जी
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