Wednesday, September 30 2026
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साहब लेंगे 'सुदर्शन क्रिया' का आनंद, जनता पूछेगी—'हमारा काम कब होगा हुजूर?'

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साहब लेंगे 'सुदर्शन क्रिया' का आनंद, जनता पूछेगी—'हमारा काम कब होगा हुजूर?'

अभिषेक कुमार पाण्डेय ,स्टेट हेड रिपोर्टर 

 

साहब लेंगे 'सुदर्शन क्रिया' का आनंद, जनता पूछेगी—'हमारा काम कब होगा हुजूर?'

 

रायपुर: सरकारी दफ्तरों में अक्सर फाइलों पर कुंडली मारकर बैठने और आम जनता को "कल आना" का मंत्र सिखाने वाले छत्तीसगढ़ के बाबुओं और अफसरों का तनाव अब हवा में उड़ेगा। सरकार का नया फरमान है—सभी सरकारी कर्मचारियों को काम के भारी बोझ से मुक्ति दिलाने के लिए 'आर्ट ऑफ लिविंग' की स्पेशल क्लास लगाई जाएगी। अब दफ्तरों में लंच टाइम के बाद खर्राटे नहीं, बल्कि अनुलोम-विलोम और ध्यान की मुद्रा देखने को मिलेगी।

जनता के टैक्स का 'वेलनेस पैकेज'

सरकार ने साफ कर दिया है कि इस अध्यात्म और वेलनेस का पूरा बिल विभाग अपने ट्रेनिंग बजट से भरेंगे। यानी टैक्सपेयर की गाढ़ी कमाई से साहब लोग 'तनाव प्रबंधन' और 'भावनात्मक संतुलन' सीखेंगे।

सुदर्शन क्रिया से क्या फाइलें तेजी से दौड़ेंगी? योजना तो यही है कि अफसर योग और प्राणायाम करके शांत दिमाग से फैसले लें।

टीमवर्क और मीठी बोली की क्लास: जनता अक्सर शिकायत करती है कि खिड़की पर बैठा बाबू सीधे मुंह बात नहीं करता। अब उन्हें 'सकारात्मक संवाद' और 'सुनने की कला' सिखाई जाएगी।

चाय की टपरी से जनता के तीखे सवाल

तनाव में अफसर हैं या कतार में खड़ी जनता? राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र या पेंशन के लिए महीनों चक्कर काटने वाली जनता का बीपी हाई होता है या एसी केबिन में बैठे साहब का?

खर्च की उपयोगिता क्या? सरकारी खजाने से लाखों रुपये आर्ट ऑफ लिविंग के शिविरों में खर्च होंगे। सवाल यह है कि इस ट्रेनिंग के बाद क्या जनता को दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी या सिर्फ साहब की 'सांस लेने की तकनीक' सुधरेगी?

क्या काम का तरीका बदलेगा? अगर ध्यान लगाने के बाद भी फाइलें टेबल के नीचे से ही सरकीं, तो फिर इस अध्यात्म का फायदा सिर्फ सरकारी बजट को हल्का करना ही माना जाएगा।

अब देखना दिलचस्प होगा कि 'आर्ट ऑफ लिविंग' सीखने के बाद सरकारी अमला 'आर्ट ऑफ वर्किंग' में कितना खरा उतरता है।

 

प्रशासनिक सुधार बनाम व्यक्तिगत कल्याण—संतुलन की तलाश

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ को शामिल करने का निर्णय शासन व्यवस्था में एक अपरंपरागत दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। कार्यस्थल पर तनाव प्रबंधन, मानसिक संतुलन और टीमवर्क को प्राथमिकता देना नीतिगत स्तर पर एक अभिनव प्रयोग दिखता है, लेकिन आर्थिक और प्रशासनिक पैमानों पर इसके गहरे निहितार्थ हैं।

आर्थिक दृष्टिकोण: सार्वजनिक धन और निवेश पर प्रतिफल (ROI)

बजट का आवंटन: प्रशिक्षण का खर्च संबंधित विभागों के निर्धारित प्रशिक्षण बजट से वहन किया जाएगा। सार्वजनिक वित्त के दृष्टिकोण से सवाल यह उठता है कि क्या प्रशिक्षण निधि का यह उपयोग सबसे प्रभावी है।

आउटपुट का मापन: कॉरपोरेट जगत में वेलनेस प्रोग्राम्स का मूल्यांकन उत्पादकता में वृद्धि और अनुपस्थिति (absenteeism) में कमी से आंका जाता है। सरकारी क्षेत्र में फाइल निस्तारण की गति, जनहित सेवाओं की त्वरित डिलीवरी और भ्रष्टाचार में कमी जैसे ठोस मापदंड तय किए बिना ऐसे कार्यक्रमों के वित्तीय रिटर्न का मूल्यांकन करना कठिन होगा।

संस्थागत क्षमता: जब राज्य के पास पहले से ही प्रशासनिक अकादमियां और लेखा-प्रशिक्षण संस्थान मौजूद हैं, तब किसी बाहरी गैर-सरकारी संगठन की तकनीकों को एकीकृत करने में होने वाले खर्च की सार्थकता परिणामों पर ही निर्भर करेगी।

प्रशासनिक दृष्टिकोण: व्यवस्थागत सुधार बनाम मानसिक शांति

तनाव के मूल कारण की अनदेखी: सरकारी कर्मचारियों का तनाव अक्सर कार्यप्रणाली की जटिलताओं, कर्मचारियों की भारी कमी, राजनीतिक दबाव, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और अस्पष्ट कार्यभार से उपजा होता है। योग और ध्यान लक्षणों को कम कर सकते हैं, लेकिन प्रक्रियात्मक और संरचनात्मक समस्याओं को हल नहीं कर सकते।

संवेदनशीलता और संवाद: यदि यह प्रशिक्षण नौकरशाही की कार्यशैली में जनता के प्रति संवेदनशीलता, सहानुभूति और पारदर्शी संचार विकसित करता है, तो यह सुशासन की दिशा में एक सकारात्मक कदम सिद्ध होगा।

जवाबदेही का प्रश्न: प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में टीमवर्क, निर्णय क्षमता और नेतृत्व को शामिल किया गया है। देखना यह होगा कि क्या यह पहल केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या वास्तविक रूप से प्रशासनिक फाइलों के त्वरित निपटान और सेवा वितरण में सुधार लाती है।

मानसिक स्वास्थ्य और कार्य-जीवन संतुलन आधुनिक प्रशासन के महत्वपूर्ण आयाम हैं, परंतु इसे संरचनात्मक सुधारों, डिजिटलीकरण और प्रशासनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। यदि सुदर्शन क्रिया और ध्यान के साथ-साथ कार्यप्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाने पर भी समान बल दिया जाए, तभी यह व्यय और नीति जनहित में सार्थक साबित होगी।

Hamar pradesh CG

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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