सन्नाटे में मशीनों की गूंज, चूल्हों पर छाने लगा संकट: वेलकम डिस्टिलरी में 4 महीने से ताला; 800 मजदूर और 4 हजार जिंदगियों पर गहराया अकाल!
कोटा के छेरकाबांधा में रोज़गार पर 'स्ट्राइक': स्प्रिट की कमी से बॉटलिंग यूनिट भी ठप होने की कगार पर; मज़दूरों ने कलेक्टर से लगाई गुहार—'साहब! साज़िश की जांच हो और प्लांट चालू कराया जाए'
बिलासपुर (विशेष रिपोर्ट)।
फैक्ट्री के भारी-भरकम लोहे के गेट बंद हैं, चिमनियों से उठता धुआं महीनों से गायब है और जिस परिसर में कभी मजदूरों के पसीने की गंध और मशीनों की खड़खड़ाहट जिंदगी का सबूत हुआ करती थी, वहां अब पसरा है सिर्फ सन्नाटा और मायूसी। बिलासपुर जिले के कोटा अंतर्गत छेरकाबांधा स्थित वेलकम डिस्टिलरीज का मुख्य प्लांट पिछले तीन-चार महीनों से बंद पड़ा है। नतीजतन, इस यूनिट से सीधे जुड़े 800 कामगारों और उन पर आश्रित करीब 4,000 परिजनों के सामने आज दो वक्त की रोटी का भयावह संकट खड़ा हो गया है।
'काम नहीं तो दाम नहीं': प्रबंधन के हाथ खड़े, कर्मचारियों के गले फंसा फंदा
मजदूरों की बदहाली का आलम यह है कि प्लांट में उत्पादन बंद होने के बाद अब तक बाहर से स्प्रिट मंगाकर बॉटलिंग का काम जैसे-तैसे घसीटा जा रहा था। अब वहां भी कच्चे माल (स्प्रिट) का टोटा पड़ गया है।
* प्लांट विभाग: लगभग 200 कर्मचारी
* बॉटलिंग विभाग: करीब 450 कर्मचारी
* वेयरहाउस व अन्य विभाग: 100 से अधिक कर्मचारी
इन सभी के सामने अब अचानक 'नो वर्क, नो पे' और छंटनी का खौफनाक मंजर है। प्रबंधन ने साफ कह दिया है कि जब तक पहिए नहीं घूमेंगे, जेब से वेतन देना मुमकिन नहीं।
साजिश की बू या प्रशासनिक पेच? छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा उतरा मैदान में
मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने मजदूरों के हक में मोर्चा खोल दिया है। कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में संगठन ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
* साजिश की आशंका: इतने वर्षों से सुचारू रूप से चल रहे प्लांट को अचानक महीनों तक बंद रखना क्या किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? इसकी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच हो।
* प्रदूषण विभाग की रिपोर्ट: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से तकनीकी रिपोर्ट मंगाकर जो भी अड़चनें हैं, उन्हें फौरन दूर किया जाए ताकि प्लांट दोबारा शुरू हो सके।
* रोके गए वेतन का भुगतान: जब तक प्रशासनिक या तकनीकी पेंच सुलझते हैं, तब तक भुखमरी की कगार पर पहुंचे मजदूरों को उनका बकाया वेतन दिलाया जाए।
सवाल व्यवस्था से: हजारों जिंदगियों का जिम्मा कौन लेगा?
यह सिर्फ एक डिस्टिलरी के बंद होने की बात नहीं है; यह कोटा अंचल की उस रीढ़ की हड्डी का टूटना है जिस पर स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों चूल्हे टिके हैं। स्कूल की फीस, बुजुर्गों की दवाइयां और राशन का खर्च—सब कुछ उस तारीख पर अटका है जब प्लांट का सायरन फिर से बजेगा।
अब गेंद सीधे जिला प्रशासन के पाले में है—क्या प्रशासन वक्त रहते इस औद्योगिक गतिरोध को तोड़कर हजारों परिवारों को राहत देगा, या फिर यह संकट भी कागजी जांचों और फाइलों के फेर में दबकर रह जाएगा?
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
हमर प्रदेश सी जी
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