सड़क के बेजुबानों को मिलेगा 'डिजिटल आधार'! माइक्रोचिप और जीपीएस कॉलर से लैस होंगे आवारा पशु और कुत्ते, कागजी घोटालों पर लगेगा ताला
नई दिल्ली / विशेष रिपोर्ट:
सड़कों पर दौड़ते आवारा मवेशी, गलियों में झुंड बनाकर घूमते कुत्ते और रोज सामने आते रूह कंपा देने वाले डॉग बाइट व सड़क हादसों के बीच अब सिस्टम एक ऐतिहासिक तकनीकी क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहा है। अब आवारा मवेशियों और कुत्तों को केवल कानों में टैग लगाकर नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि इंसानों की तरह इनका भी एक 'यूनिक डिजिटल रिकॉर्ड' तैयार होगा।

माइक्रोचिप, जीपीएस स्मार्ट कॉलर और क्यूआर कोड (QR Code) आधारित इस डिजिटल डेटाबेस के जरिए प्रशासन अब यह तय करेगा कि कौन-सा जानवर किस गली का है, कब उसका टीकाकरण हुआ और उसकी नसबंदी हुई भी या सिर्फ फाइलों में लाखों के बजट डकार लिए गए!
कागजी नसबंदी और फर्जी टीकों के खेल पर नकेल
अब तक नगर निगमों और पंचायतों में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) और रेबीज वैक्सीनेशन के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे होते रहे हैं। एक ही कुत्ते या मवेशी को कई बार कागजों में 'वैक्सीनेटेड' और 'नसबंदीशुदा' दिखाकर बिल पास करा लिए जाते थे।

इस नई डिजिटल प्रणाली के लागू होते ही:
यूनिक डिजिटल आईडी: हर जानवर की त्वचा के नीचे माइक्रोचिप या गले में क्यूआर कोड वाला स्मार्ट कॉलर लगाया जाएगा।
एक क्लिक पर मेडिकल कुंडली: मोबाइल या स्कैनर से स्कैन करते ही पता चल जाएगा कि किस डॉक्टर ने कब नसबंदी की, रेबीज का टीका कब लगा और अगली खुराक कब तय है।
फर्जी बिलिंग का खात्मा: दोबारा एक ही जानवर के नाम पर सरकारी खजाने में सेंधमारी मुमकिन नहीं होगी।

आक्रामक कुत्तों और सड़क पर मवेशी छोड़ने वाले मालिकों की अब खैर नहीं
इस डिजिटल व्यवस्था से न केवल पशु कल्याण सुनिश्चित होगा, बल्कि आम नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा को लेकर भी बड़ा बदलाव आएगा:
आक्रामकता की ट्रैकिंग: अगर किसी इलाके में कोई कुत्ता बार-बार लोगों को दौड़ाता या काटता है, तो उसके डिजिटल रिकॉर्ड में 'एग्रेसिव बिहेवियर' दर्ज होगा। दो से ज्यादा बार हमला करने वाले जानवरों को सीधे शेल्टर होम में शिफ्ट किया जाएगा।
मालिकों पर कसेगा शिकंजा: अक्सर लोग गाय, बैल या बीमार पालतू कुत्तों को दूध निकालने या बूढ़े होने के बाद सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं। डिजिटल चिप के जरिए मालिक का नाम-पता सामने आ जाएगा और सड़क पर जानवर लावारिस छोड़ने पर मालिक पर भारी जुर्माना और कानूनी केस दर्ज होगा।
सड़क हादसों में कमी: हाईवे और व्यस्त सड़कों पर मवेशियों के जमावड़े को जीपीएस मॉनिटरिंग के जरिए ट्रैक कर समय रहते काउ शेल्टर पहुंचाया जा सकेगा।

हाईटेक तकनीक से क्या बदलेगी जमीनी तस्वीर?
यह पहल सुनने में जितनी चमत्कारी और आधुनिक लगती है, उसकी सबसे बड़ी चुनौती इसका जमीनी क्रियान्वयन है। देश भर में करोड़ों की तादाद में घूम रहे बेसहारा जानवरों को ट्रैक करना, सर्वर को 24 घंटे अपडेट रखना और हर वार्ड स्तर पर मॉनिटरिंग टीमें तैनात करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
अगर यह सिस्टम पूरी ईमानदारी से जमीन पर उतर गया, तो यह न केवल बेजुबानों को क्रूरता और भूख से बचाएगा, बल्कि खौफ के साए में जीने वाले आम राहगीरों और मासूम बच्चों को भी एक सुरक्षित सड़क दे सकेगा।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़

हमर प्रदेश सी जी
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