शिक्षा का ‘कैपिटल’ या निरक्षरता का गढ़? बिलासपुर में 1.13 लाख अनपढ़; बस्तर-सरगुजा जैसे वनांचल भी निकले आगे
हाइकोर्ट, सेंट्रल यूनिवर्सिटी और दर्जनों नामी कॉलेज वाले शहर की जमीनी हकीकत ने उड़ाए सरकार के होश, स्कूल शिक्षा विभाग के सर्वे में सबसे निचले पायदान पर ‘न्यायधानी’
बिलासपुर
छत्तीसगढ़ की 'न्यायधानी' और प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा एजुकेशन हब कहा जाने वाला बिलासपुर आज एक ऐसे कड़वे सच के मुहाने पर खड़ा है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। जिस शहर में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट है, गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय है, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों का जाल है, वही बिलासपुर आज पूरे छत्तीसगढ़ में निरक्षरता (Illiteracy) के मामले में नंबर-1 बन गया है।
स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से प्रदेश के सभी 33 जिलों में कराए गए गहन साक्षरता सर्वे ने एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिस पर एक बार को यकीन करना मुश्किल लगता है।
आंकड़ों का आईना: जब बस्तर ने बिलासपुर को पछाड़ा
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि कागजी विकास और असल साक्षरता में कितना भारी अंतर आ चुका है:
* राज्य में कुल निरक्षर: 9,76,079
* अकेले बिलासपुर में निरक्षर: 1,13,288 (राज्य के कुल असाक्षरों का 11% से अधिक हिस्सा केवल एक जिले में)
* बस्तर संभाग की स्थिति: दशकों तक नक्सलवाद और बीहड़ जंगलों की चुनौतियों से जूझने वाले बस्तर में निरक्षरों का आंकड़ा सिमटकर मात्र 7,997 रह गया।
* सरगुजा संभाग की स्थिति: आदिवासी बाहुल्य सरगुजा जिले में यह संख्या केवल 3,568 दर्ज की गई।
जहाँ गोलियों की गूँज और घने जंगलों के बीच रहने वाले बच्चे और ग्रामीण मुख्यधारा की शिक्षा अपना रहे हैं, वहीं हर नुक्कड़ पर स्कूल-कोचिंग लेकर बैठा बिलासपुर निरक्षरता के अंधेरे में कैसे डूब गया—यह नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ा चुभता सवाल है।
‘स्कूल चलो अभियान’ का करोड़ों का बजट कहाँ गया?
सालों से 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' और 'स्कूल चलो अभियान' के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। फाइलों में दर्ज हुआ—शत-प्रतिशत दाखिला। लेकिन हकीकत में क्या हुआ?
* कागजी एडमिशन बनाम जमीनी हकीकत: कागजों पर बच्चे का दाखिला तो दर्ज हो गया, लेकिन वह कभी ककहरा सीख ही नहीं पाया।
* मजदूरी और पलायन का दुष्चक्र: बिलासपुर के ग्रामीण अंचलों और शहर की मलिन बस्तियों के बच्चे बाल मजदूरी, रोजी-रोटी और पलायन के भंवर में फँसकर स्कूल की चौखट से हमेशा के लिए दूर हो गए।
* 'साइलेंट ड्रॉपआउट': बच्चे स्कूल छोड़ते गए, लेकिन प्रशासनिक फाइलों में दाखिले की संख्या वैसी ही बनी रही ताकि अफसरों की पीठ थपथपाई जा सके।
‘उल्लास’ के सहारे चेहरा चमकाने की तैयारी
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। अब केंद्र और राज्य सरकार के साझा प्रयास से चलने वाले ‘उल्लास’ (नव भारत साक्षरता कार्यक्रम) के जरिए इन असाक्षरों को साक्षर बनाने की आपात कवायद शुरू की गई है।
गड़बड़ी रोकने के लिए निरक्षरों और स्वयंसेवी शिक्षकों का डिजिटल पोर्टल पर पंजीयन कराया जा रहा है, जिसके बाद एक महा-परीक्षा आयोजित की जाएगी।
बड़ा सवाल: क्या एक परीक्षा से मिट जाएगा यह दाग?
प्रशासनिक स्तर पर योजनाएं तो बन रही हैं, लेकिन कड़वा सच यही है कि जब तक शिक्षकों की नियमित जवाबदेही तय नहीं होगी और शहर की झुग्गियों व सुदूर गांवों में पल रहे आखिरी बच्चे तक निगरानी तंत्र नहीं पहुंचेगा, तब तक सिर्फ एक परीक्षा करा देने से यह कलंक नहीं धुलने वाला।
कंक्रीट की चौड़ी सड़कें और चमचमाते संस्थान किसी शहर का भविष्य तय नहीं करते; अगर शहर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने दस्तखत तक न कर पाए, तो यह विकास सिर्फ कागजी छलावा ही माना जाएगा।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
हमर प्रदेश सी जी
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