अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
भनवारटंक टनल में तेंदुए की बची जान: लोको पायलट की सूझबूझ को क्या मिलेगा सम्मान या कागजी फाइलों में दबेगा मामला?
बिलासपुर-कटनी रेल मार्ग: भनवारटंक भोगदा (टनल) के घने अंधेरे में ट्रेन के आगे दौड़ते तेंदुए का वायरल वीडियो सामने आने के बाद रेलवे के गलियारों से लेकर पर्यावरण महकमे तक हलचल मच गई है। तेज रफ्तार ट्रेन के सामने अचानक आए बेजुबान को देखकर लोको पायलट ने जिस तत्परता और पेशेवर दक्षता से इमरजेंसी ब्रेक लगाकर गति नियंत्रित की, उसने न सिर्फ एक वन्यजीव की जान बचाई, बल्कि यात्रियों को भी बड़े हादसे के खौफ से बाहर निकाला।
लेकिन इस घटना के बाद अब सबसे बड़ा सवाल रेलवे प्रशासन, केंद्रीय रेल मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालयों की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है।
जांबाज लोको पायलट को क्या मिलेगा इनाम, पदक और प्रमोशन?
हादसा टालने वाले चालक दल की सतर्कता की हर तरफ तारीफ हो रही है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही अब भी तय नहीं हुई है:
बिलासपुर रेल मंडल (SECR) से सवाल: क्या SECR प्रशासन लोको पायलट और संबंधित क्रू को संरक्षा पुरस्कार (Safety Award), नकद प्रोत्साहन राशि और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित करेगा? यह घोषणा कब तक होगी?
केंद्रीय रेल मंत्री से गुहार: कर्तव्यनिष्ठा और त्वरित निर्णय क्षमता का परिचय देने वाले रेलकर्मियों को क्या रेल मंत्रालय की ओर से विशेष 'रेल मंत्री संरक्षा पदक' और समय-पूर्व पदोन्नति (आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन) का लाभ मिलेगा?
पुरस्कार का पैमाना: क्या ऐसे साहसिक कदमों को केवल औपचारिक पीठ थपथपाने तक सीमित रखा जाएगा या ठोस वित्तीय व सेवा लाभ देकर भविष्य के लिए मिसाल कायम की जाएगी?
केंद्रीय व राज्य पर्यावरण मंत्रालय के सामने खड़े असहज सवाल
जंगल और टनल के बीच पटरियों पर वन्यजीवों की आवाजाही ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और छत्तीसगढ़ राज्य वन विभाग की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं:
एआई आधारित डिटेक्शन सिस्टम कब? देश के कई संवेदनशील एलिफेंट/वाइल्डलाइफ कॉरिडोर की तरह बिलासपुर-कटनी रूट के इस वन क्षेत्र में सेंसर और ऑप्टिकल फेंसिंग कैमरे कब लगाए जाएंगे?
स्पीड रिस्ट्रिक्शन की निगरानी: घने जंगलों और सुरंगों के मुहाने पर ट्रेनों की गति सीमा तय करने और उसका कड़ाई से पालन कराने के लिए रेलवे और वन विभाग की संयुक्त टास्क फोर्स अब तक सक्रिय क्यों नहीं हुई?
पर्यावरणीय तालमेल का अभाव: केंद्र और राज्य के पर्यावरण मंत्रालयों का बजट वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित करने में कहाँ खर्च हो रहा है, जबकि पटरियों पर हर दिन बेजुबानों की जिंदगी दांव पर लगी रहती है?
निगरानी और समन्वय ही एकमात्र हल: लोको पायलट की सूझबूझ हर बार चमत्कार नहीं कर सकती। जब तक बिलासपुर रेल मंडल, केंद्रीय रेल मंत्रालय और राज्य-केंद्र का पर्यावरण विभाग मिलकर ठोस सुरक्षा ढांचा (जैसे अंडरपास, इको-डक्ट्स और ट्रैक फेंसिंग) तैयार नहीं करते, तब तक जंगल के बीच से गुजरने वाले ये रेल मार्ग हादसों के मुहाने पर ही खड़े रहेंगे।
इस रेलखंड के घने जंगलों और ऐतिहासिक सुरंग के विहंगम दृश्य को भनवारटंक घाटी रेलवे टनल सफर के जरिए करीब से समझा जा सकता है, जो इस इलाके की जटिल भौगोलिक स्थिति और वन्यजीव संवेदनशीलता को दर्शाता है।
हमर प्रदेश सी जी

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