अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर छत्तीसगढ़
बिलासपुर में 'सिस्टम' की खुली लूट: चुनावी वादों के ठंडे तवे पर फिर सिकी 1.40 करोड़ की ‘मांडवाली’ रोटी, स्मार्ट सिटी का नया FDR कांड!
77 लाख का घोटाला दबा नहीं और अब 1.40 करोड़ का नया खेल; 9 साल से अटकी फाइल पर अचानक मेहरबान हुए अफसर, ‘खास नेताजी’ की मध्यस्थता में बंटा मलाईदार हिस्सा!
विशेष पड़ताल | न्यायधानी (बिलासपुर)
स्मार्ट सिटी और नगर निगम बिलासपुर में जनता के खून-पसीने की कमाई को किस तरह 'मांडवाली' की मेज पर परोसा जाता है, इसका सबसे ताज़ा और शर्मनाक नमूना एक बार फिर सामने आया है। पहले 77 लाख के एफडीआर (FDR) घोटाले की आग को चुनावी बयानों से बुझाने का ढोंग किया गया, और अब उसी ठंडी राख के नीचे 1 करोड़ 40 लाख रुपये का एक और बड़ा 'एफडीआर कांड' चुपचाप अंजाम दे दिया गया।
सवाल सीधा है—जो भुगतान 9-10 सालों से संदिग्ध मानकर दबा हुआ था, अचानक जुलाई के आखिरी और अगस्त के पहले हफ्ते में उस पर मेहरबानी की बारिश कैसे हो गई? क्या फाइलों में नियम बदल गए या फिर 'नेताजी' के दखल से सिस्टम ने अपनी आँखें और जमीर दोनों बेच दिए?

खेल का चक्रव्यूह: पैकेज टेंडर, पेटी ठेकेदार और 8 साल का 'सेटिंग' काल
यह पूरा खेल पूर्व कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ था, जब अलग-अलग विकास कार्यों को टुकड़ों में बांटने के बजाय भारी-भरकम 'पैकेज टेंडर' का रूप दिया गया।
* दफ्तरों से सिंडिकेट: बस स्टैंड और रामा मैग्नेटो मॉल के पास खुले दो अड्डों से पेटी ठेकेदारी का खुला रैकेट चला।
* सड़कें बनीं नहीं कि उधड़ गईं: एक रसूखदार फर्म को 3 पैकेज थमाए गए। उसने कमीशन काटकर काम मैग्नेटो मॉल वाले सिंडिकेट को थमा दिया। नतीजा यह हुआ कि निर्माण होते ही सड़कें और नालियां उधड़ने लगीं।

* छोटे ठेकेदार कंगाल, बड़े खिलाड़ी मालामाल: जब काम बिगड़ा तो छोटे पेटी ठेकेदारों को झोंक दिया गया, जो आज भी अपने चंद रुपयों के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। लेकिन मुख्य फर्म के 1.40 करोड़ के एफडीआर, एसडी (SD) और रॉयल्टी को सिस्टम से बाहर निकालने के लिए 8 साल बाद एक ‘खास नेताजी’ ने दलाली की बिसात बिछाई और खेल खत्म कर दिया।
तीन बड़े सवाल, जो अफसरों और हुक्मरानों के गले की फांस बनेंगे:
* राजसात करने के बजाय 'तोहफा' क्यों?
अगर ठेकेदार का काम गुणवत्ताहीन था और तय समय पर पूरा नहीं हुआ, तो नियम के मुताबिक उसकी एफडीआर और जमानत राशि राजसात (Forfeit) होनी चाहिए थी। फिर 1.40 करोड़ रुपये फर्म की झोली में किसके आदेश पर डाले गए?
* 9 साल बाद साइट इंजीनियर को क्या 'दिव्य दृष्टि' मिली?
3-3, 4-4 जोनों के कमिश्नर और साइट इंजीनियरों ने 9 साल बाद किस आधार पर ओके (OK) रिपोर्ट थमा दी? जो काम सालों पहले गायब हो चुका था, उसका भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किस जादू से हो गया?

* चुनावी वादों का क्या हुआ?
होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 77 लाख के पुराने घोटाले पर जांच और जेल का दावा ठोकने वाले आज किस बिल में छिपे हैं? सत्ता बदले डेढ़ साल से अधिक बीत गया, नई महापौर भी आ गईं, लेकिन जांच की जगह 1.40 करोड़ की नई ‘अंगाकर रोटी’ सिक गई!
आधा शहर नाले में, अफसर मलाई खाने में!
अरबों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन बिलासपुर की हकीकत क्या है?
* पहली ही बारिश में आधा शहर तालाब बन जाता है।
* लोग खुले नालों में बह रहे हैं।
* पुराना बस स्टैंड के पास जमीन फाड़कर इंसान निकलने जैसे खौफनाक मंजर सामने आते हैं।
स्मार्ट सिटी के नाम पर न्यायधानी के चेहरे पर सिर्फ 'स्नो-पाउडर' पोता गया, ताकि भीतर का भ्रष्टाचार छिप सके। डिप्टी सीएम से लेकर बड़े-बड़े हुक्मरानों ने जांच की बातें तो कीं, लेकिन जमीनी हकीकत ढाक के तीन पात ही रही। जनता त्रस्त है और निगम के चहेते ठेकेदार-अफसर मस्त हैं।
कुर्सी का गोलमोल जवाब: "दस्तावेज देखकर बताऊंगा"
जब इस पूरे 1.40 करोड़ के खेल पर नगर निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे से सीधा सवाल किया गया कि 8-9 साल से अटकी संदिग्ध राशि का भुगतान अचानक किसके दबाव और किस रिपोर्ट पर हुआ?
तो उनका रटा-रटाया, ठंडा जवाब था—
> "मैं दस्तावेज देखकर ही कुछ बता पाऊंगा।"
अफसर फाइलों का बहाना बना सकते हैं, लेकिन बिलासपुर की जनता यह बखूबी समझ रही है कि फाइलों के पीछे 'मांडवाली' का कितना बड़ा सौदा हुआ है। अब देखना यह है कि इस 1.40 करोड़ के अंगाकर को पचाने वाले बेनकाब होते हैं या यह मामला भी फाइलों की धूल में दफन कर दिया जाएगा!
हमर प्रदेश सी जी

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