ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन: पटरियों पर 'प्रसाद' की तरह बंटती सजाएं, केबिन में खौफ और दांव पर लाखों मुसाफिरों की जिंदगी!
बिलासपुर/शहडोल/बिजुरी:
भारतीय रेल की आधिकारिक नियमावली कहती है—"गाड़ी का संचालन तभी सुरक्षित है, जब चालक का दिमाग तनावमुक्त हो।"
लेकिन दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) के बिलासपुर मंडल में लोको केबिन के भीतर की हकीकत इसके उलट है। यहाँ लोको पायलट लाल सिग्नल या तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि अपने ही प्रशासनिक मुखिया के नाम से कांप रहे हैं।
बिलासपुर मंडल के बिलासपुर, बिजुरी, शहडोल, सूरजपुर, रायगढ़, पेंड्रा रोड और खरसिया जैसे प्रमुख क्रू लॉबियों में माहौल बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। सैकड़ों लोको रनिंग स्टाफ ने कामकाज के बाद धरने का रुख कर लिया है। उनका सीधा और खुला आरोप है—सीनियर डीईई (Senior DEE) शशांक कोस्टा की प्रशासनिक मनमर्जी और प्रताड़ना ने कार्यस्थल को 'दहशत का अड्डा' बना दिया है।

1. 3-3 साल का इंक्रीमेंट बंद: 'प्रसाद' की तरह बांटी जा रही चार्जशीट
धरने पर बैठे रनिंग स्टाफ की पीड़ा केवल सामान्य काम के दबाव की नहीं है, बल्कि एकतरफा दंडात्मक कार्रवाइयों की है।

कर्मचारियों का कहना है कि विभाग के प्रमुख अधिकारी के साथ संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका है। रेलवे संचालन में कभी कोई असामान्य स्थिति बने या किसी चालक को 'बुक-ऑफ' कर पूछताछ के लिए बुलाया जाए, तो सामान्य प्रक्रिया उसका पक्ष सुनने की होती है। लेकिन यहाँ कर्मचारियों का आरोप है:
* चालक से घटना की तकनीकी वजह पूछी ही नहीं जाती।
* सीधे आदेश सुना दिया जाता है—3 साल का इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) बंद।
* विभागीय जांच और निष्पक्ष सुनवाई के बिना दंडात्मक फरमान जारी हो रहे हैं।
कर्मचारियों के शब्दों में—"अधिकारी को लगता है कि स्टाफ उनका दुश्मन है। सजा ऐसे बांटी जा रही है जैसे प्रसाद बंट रहा हो।"
2. 'शंटिंग' के नियमों पर चुप्पी: संरक्षा का असली खतरा यहीं है
प्रदर्शन कर रहे पायलटों ने जो सबसे तकनीकी और खतरनाक मुद्दा उठाया है, वह है गाड़ियों की शंटिंग और संरक्षा नियम।
रेलवे यार्डों में इंजनों और रैक को जोड़ना-काटना (Shunting) एक बेहद संवेदनशील प्रक्रिया है। इसमें जरा सी मानवीय या तकनीकी चूक पूरे ट्रैक को बाधित कर सकती है या बड़े हादसे का रूप ले सकती है।
लोको पायलटों का कहना है:
* वे पिछले पांच दिनों से बिजुरी और अन्य जगहों पर अधिकारियों से सिर्फ एक सवाल का जवाब मांग रहे हैं—शंटिंग संरक्षा नियमों के तहत कराई जाए या नहीं?
* लेकिन कोई भी जिम्मेदार अफसर इस पर लिखित या स्पष्ट गाइडलाइन देने को तैयार नहीं है।
* मौखिक दबाव डालकर काम कराया जाता है, और यदि कोई चूक हो जाए तो सारा ठीकरा लोको पायलट के सिर फोड़कर उसकी नौकरी और करियर पर प्रहार कर दिया जाता है।
3. जब 'रक्षक' से ही संवाद खत्म हो जाए: सिस्टम का दोहरा चरित्र
रेलवे के संगठनात्मक ढांचे में सीनियर डीईई को रनिंग स्टाफ का 'गार्जियन' यानी अभिभावक माना जाता है। लोको पायलट विषम परिस्थितियों में रात-दिन काम करते हैं, जहां थकान, रात की ड्यूटी और तनाव आम बात है। ऐसे में अधिकारी की जिम्मेदारी उनके मानसिक मनोबल को बनाए रखने की होती है।
विडंबना देखिए:
* निचले स्तर पर संवादहीनता: सुपरवाइजरों और रनिंग पायलटों के लिए अधिकारी के दरवाजे बंद हैं। संवाद के नाम पर केवल नोटिस और चार्जशीट चल रही है।
* शीर्ष स्तर पर अनसुनी: जब परेशान कर्मचारी अपनी शिकायत लेकर मंडल के शीर्ष उच्चाधिकारियों के पास पहुंचे, तो कथित तौर पर उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि "हम सीनियर डीईई के खिलाफ आप लोगों से कोई बात नहीं करेंगे।"
जब समाधान का हर दरवाजा बंद कर दिया गया, तब कर्मचारियों को ट्रेनों के सुरक्षित पहियों की जिम्मेदारी के साथ-साथ धरने पर बैठने को मजबूर होना पड़ा।
4. सबसे बड़ा सवाल: डिप्रेशन में दौड़ती ट्रेनें, जिम्मेदार कौन?
रेल मंत्रालय हर महीने 'सेफ्टी ड्राइव' चलाता है। बैठकों में बड़े-बड़े प्रेजेंटेशन दिए जाते हैं कि रनिंग स्टाफ को पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और पूरी तरह तनावमुक्त माहौल मिलना चाहिए ताकि 'सिग्नल पास्ड एट डेंजर' (SPAD) जैसी गंभीर दुर्घटनाएं न हों।
लेकिन जब पायलट केबिन में बैठते समय यह सोचेगा कि ड्यूटी खत्म होते ही कहीं उसकी 3 साल की रोजी-रोटी पर कैंची न चल जाए, तो उसका ध्यान ट्रैक पर रहेगा या अपने भविष्य की चिंता पर?
तनाव में चल रहे लोको पायलटों से सुरक्षित यात्रा की उम्मीद करना मुसाफिरों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ है।
आंदोलन का अल्टीमेटम: आर-पार की लड़ाई
बिलासपुर मंडल के सभी लॉबियों में आंदोलन की लपटें फैल चुकी हैं। कर्मचारियों ने साफ संदेश दे दिया है:
* तानाशाही खत्म हो: रेलवे के तय नियमों (Railway Service Conduct & Discipline Rules) के मुताबिक ही जांच और कार्रवाई हो, किसी अधिकारी के व्यक्तिगत 'एटीट्यूड' से नहीं।
* संरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन: शंटिंग और ट्रेन संचालन को लेकर बने सुरक्षा प्रोटोकॉल पर स्पष्टता दी जाए, जोखिम भरे शॉर्टकट बंद हों।
* उच्चस्तरीय हस्तक्षेप: जब तक जोनल मुख्यालय और रेलवे बोर्ड स्तर से हस्तक्षेप कर इस तानाशाही का स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता, यह आंदोलन जारी रहेगा।
अब गेंद रेलवे प्रशासन के पाले में है—क्या वह किसी एक अधिकारी के हठ को बचाएगा, या पटरियों पर दौड़ती लाखों जिंदगियों की संरक्षा को प्राथमिकता देगा?
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़

हमर प्रदेश सी जी
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