नक्सल भय खत्म होते ही अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई ‘घोटुल’ की गौरवशाली परंपरा
Tuesday, September 29 2026
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नक्सल भय खत्म होते ही अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई ‘घोटुल’ की गौरवशाली परंपरा

DHANIRAM- संपादक hamarpradeshcg.com
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नक्सल भय खत्म होते ही अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई ‘घोटुल’ की गौरवशाली परंपरा

नक्सल भय खत्म होते ही अबूझमाड़ में फिर जीवंत हुई ‘घोटुल’ की गौरवशाली परंपरा

 

जगदलपुर। बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में लंबे समय तक नक्सली भय और हिंसा के कारण प्रभावित रही पारंपरिक ‘घोटुल’ संस्कृति अब फिर से जीवंत होती दिखाई दे रही है। अंदरूनी गांवों में ग्रामीण अपनी प्राचीन परंपराओं को सहेजने के लिए पारंपरिक घोटुलों का पुनर्निर्माण कर रहे हैं।

 

गांवों में फिर सुनाई देने लगी मांदर की थाप

 

अबूझमाड़ के झारावाही जैसे गांवों में ग्रामीण स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल तैयार कर रहे हैं। सूर्य ढलने के बाद यहां मांदर की थाप और लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगी है। बुजुर्ग नई पीढ़ी को समाज के नियम, रीति-रिवाज, लोकगीत, नृत्य और सामुदायिक जिम्मेदारियों की जानकारी दे रहे हैं।

 

कभी शाम होते ही सुरक्षा को लेकर घरों में सिमट जाने वाले ग्रामीण अब सामुदायिक गतिविधियों में फिर से भाग ले रहे हैं। सुरक्षा वातावरण में आए बदलाव के साथ ग्रामीणों में अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी उत्साह बढ़ा है।

 

संस्कृति और सामाजिक शिक्षा का केंद्र है घोटुल

 

आदिवासी समाज में घोटुल को केवल मनोरंजन या सामूहिक मिलन का स्थान नहीं माना जाता, बल्कि यह लोकसंस्कृति, अनुशासन, सामाजिक मूल्यों और सामुदायिक जीवन की पारंपरिक पाठशाला के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

नई पीढ़ी घोटुल के माध्यम से बुजुर्गों से पारंपरिक ज्ञान और लोककला सीख रही है। इससे लंबे समय से प्रभावित सांस्कृतिक गतिविधियों को फिर से गति मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

 

शांति के साथ विकास की भी उम्मीद

 

ग्रामीणों का कहना है कि घोटुलों का पुनर्जीवन उनके लिए केवल सांस्कृतिक गतिविधि की वापसी नहीं, बल्कि अबूझमाड़ की सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान के मजबूत होने का प्रतीक है।

 

सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ ग्रामीणों की आवाजाही, खेती-किसानी, हाट-बाजार और पारंपरिक त्योहारों में भी उत्साह लौटने की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि इस सकारात्मक बदलाव को स्थायी बनाने के लिए क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है।

 

अबूझमाड़ के गांवों में घोटुल की लौटती रौनक इस बात का संकेत है कि शांति और सुरक्षा के साथ स्थानीय संस्कृति को भी नई ऊर्जा मिल रही है।

 

स्टेट रिपोर्टर — मनोज भट्ट

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in Entertainment.

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