Tuesday, September 29 2026
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नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की: आधी रात टूटेगी माया की बेड़ियां, 46 मिनट के महामुहूर्त में पधारेंगे 5253वें साल के कान्हा!

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नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की: आधी रात टूटेगी माया की बेड़ियां, 46 मिनट के महामुहूर्त में पधारेंगे 5253वें साल के कान्हा!

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की: आधी रात टूटेगी माया की बेड़ियां, 46 मिनट के महामुहूर्त में पधारेंगे 5253वें साल के कान्हा!

घनघोर घटाएं, उफनती यमुना, जकड़ी हुई लोहे की बेड़ियां और कंस का खौफनाक पहरा... द्वापर युग का वही तिलिस्म आज फिर जीवंत हो उठा है। भाद्रपद की अंधेरी रात का सन्नाटा चीरते हुए आज ठीक आधी रात जब घड़ी की सुइयां 11:57 पर मिलेंगी, तब परब्रह्म के 5253वें प्राकट्य का शंखनाद होगा।

रोहिणी नक्षत्र के साए में आज फिर कारागार के ताले अपने-आप चटकेंगे और सूप में सवार होकर नटखट कन्हैया भक्तों के घरों, मंदिरों और मखमली झूलों पर विराजेंगे।

घड़ी की सुइयों पर नजर: 46 मिनट का दिव्य निशिता काल

ज्योतिष गणनाओं के अनुसार, प्रभु के अवतरण का सबसे पवित्र समय आधी रात का निशिता काल माना गया है:

 * प्रकटोत्सव का महामुहूर्त: रात 11:57 बजे से देर रात 12:43 बजे तक (कुल 46 मिनट, जब कान्हा का जन्मोत्सव और अभिषेक होगा)।

 * तिथि चक्र: अष्टमी तिथि 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक प्रभावी रहेगी।

 * पारण का समय: व्रत रखने वाले साधक 5 सितंबर को सुबह 05:47 बजे सूर्योदय के उपरांत ही अन्न-जल ग्रहण कर पारण करेंगे।

चरणामृत से पालने तक: बाल गोपाल के स्वागत की 5 सीढ़ियां

 * पंचामृत से स्नान: दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल की शीतल धाराओं से देवकीनंदन का अभिषेक करें।

 * पीतांबर और मोरपंख: स्नान के बाद ठाकुर जी को चमचमाते पीले वस्त्र धारण कराएं, माथे पर चंदन का तिलक और मुकुट पर तिरछा मोरपंख सजाएं।

 * मनपसंद भोग: चांदी या मिट्टी की कटोरी में मिश्री मिला ताजा माखन और ऊपर एक पत्ता तुलसी दल—यह कान्हा का सबसे प्रिय भोग है।

 * घंट-घड़ियाल और आरती: शंख की गूंज और घंटियों की मधुर धुन के साथ 'आरती कुंजबिहारी की' गाकर माहौल को कृष्णमय करें।

 * झूला झुलाने की होड़: आरती के बाद बाल गोपाल को रेशमी डोरियों से बंधे पालने में विराजित कर श्रद्धा से झुलाएं।

अग्नि पुराण की गवाही: क्यों हर उपवास से भारी है अष्टमी की यह रात?

शास्त्र कहते हैं कि साल के 365 दिनों में यह एक रात ऐसी है, जो जन्म-जन्मांतर के संचित पापों के बंधनों को वैसे ही काट देती है, जैसे वसुदेव जी के पैरों की बेड़ियां कटी थीं। अग्नि पुराण के अनुसार, जो साधक इस रात जागकर निशिता काल में प्रभु का ध्यान करता है, उसके कुल का उद्धार तय माना जाता है और अंत समय में उसे वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

वो अमर गाथा: जब यमुना ने छुए नन्हे चरण

आकाशवाणी से थर्राया कंस जब अपनी बहन देवकी के सात नवजातों को शिला पर पटक चुका था, तब आई वह आठवीं संतानी रात। मूसलाधार बारिश के बीच चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर प्रभु ने लीला रची।

पहरेदार सोए, जंजीरें खुलीं, और सूप में भगवान को सिर पर उठाए वसुदेव जी ने कदम बढ़ा दिए। गरजती लहरों वाली यमुना तब तक उफनती रही, जब तक उसने बालकृष्ण के चरण स्पर्श नहीं कर लिए। गोकुल में यशोदा की गोद में कान्हा मुस्कुराए और कंस के महलों में काल की उल्टी गिनती शुरू हो गई।

आज वही रात है... मंदिरों में गूंजता घंटा, माखन की महक और पालने में झूलते लल्ला, यही गवाही दे रहे हैं कि जब-जब अधर्म की अति होगी, वासुदेव किसी न किसी रूप में उतर ही आएंगे।

 

 

अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़ 

 

हमर प्रदेश सी जी

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in Entertainment.

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