डॉक्टर बनने का सपना लेकर निकले थे अमर अग्रवाल, पिता के संस्कारों ने बनाया सियासत का माहिर खिलाड़ी
बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में पूर्व कैबिनेट मंत्री ने खोले जिंदगी के कई अनछुए पन्ने; प्रशासनिक दक्षता, स्वास्थ्य क्रांति और अरपा नदी पर रखी बेबाक राय
बिलासपुर। कभी डॉक्टर बनने की चाह रखने वाले अमर अग्रवाल आज छत्तीसगढ़ की राजनीति के उन कद्दावर चेहरों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान उनके प्रशासनिक कौशल और निर्णय लेने की गति से है। बिलासपुर प्रेस क्लब के 'हमर पहुना' कार्यक्रम में वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने अपने छात्र जीवन से लेकर 15 साल तक कैबिनेट मंत्री रहने के सफर को खुलकर साझा किया। उन्होंने दो टूक कहा— "जो काम नहीं आता, उसे सीखने में झिझक कैसी? सीखना मेरी आदत भी है और जुनून भी।"

घर से मिली राजनीति की पहली तालीम
अमर अग्रवाल ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने पिता स्व. लखीराम अग्रवाल को दिया। उन्होंने कहा कि उनके घर पर सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे और राजमाता सिंधिया जैसे दिग्गजों का आना-जाना था। पिता ने कभी पीए (निजी सहायक) तक नहीं रखा और सादगी से काम किया। पिता के साथ हाथ बंटाते-बंटाते राजनीति की बारीकियां खुद-ब-खुद समझ में आने लगीं।
सफर: साइंस कॉलेज से लेकर कैबिनेट तक
* शुरुआती पढ़ाई: 22 सितंबर 1963 को खरसिया में जन्म के बाद बिलासपुर में बायोलॉजी पढ़ी। रायपुर के साइंस कॉलेज और फिर दुर्ग होते हुए बिलासपुर के सीएमडी कॉलेज से बीकॉम किया।
* सियासी एंट्री: छात्र राजनीति के बाद 1996 में भाजयुमो जिलाध्यक्ष बने।
* चुनावी जीत: 1998 में पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद 2003 से लगातार सत्ता और संगठन में अहम जिम्मेदारियां निभाईं।
नार्वे के मॉडल से छत्तीसगढ़ में दौड़ी ‘108’ और ‘102’
स्वास्थ्य मंत्री के कार्यकाल को याद करते हुए अमर अग्रवाल ने बताया कि स्वास्थ्य ढांचे को समझने के लिए वे विदेश गए थे। नार्वे में अध्ययन के दौरान यह समझ आया कि केवल डॉक्टर बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि आपातकालीन प्रबंधन सबसे अहम है। इसी सोच से छत्तीसगढ़ में संजीवनी 108 और महतारी 102 जैसी जीवनरक्षक एंबुलेंस सेवाओं की शुरुआत हुई, जिसने ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य तंत्र को पूरी तरह बदल दिया।
फाइल समझने से 1 घंटे में 100 फाइलों के निपटारे तक
प्रशासनिक अनुभव पर बात करते हुए उन्होंने एक दिलचस्प वाकया सुनाया:
* पहली फाइल का डर: जब पहली बार वित्त और उद्योग मंत्रालय मिला, तो फाइल निपटाने का नियम तक नहीं पता था।
* सीखने का जज्बा: पहली बार ध्वजारोहण से पहले तत्कालीन कलेक्टर और एसपी को बंगले बुलाकर परेड और सलामी का प्रोटोकॉल सीखा।
* वर्क एफिशिएंसी: लगातार अध्ययन और कार्यप्रणाली समझने के बाद हालात ऐसे बने कि वे एक घंटे में 100-100 फाइलों का निपटारा करने लगे।
अरपा और शहर के विकास पर स्पष्ट रुख
* अरपा नदी का दर्द: उन्होंने कहा कि अरपा के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ हुई है। शिवघाट और पचरीघाट जैसे प्रोजेक्ट बनने के बावजूद पानी रोकने की समस्या बरकरार है, जिस पर उन्होंने लिखित आपत्ति भी दर्ज कराई थी।
* 30 साल का मास्टरप्लान: बिलासपुर के अगले तीन दशकों की जरूरतों को देखते हुए मास्टरप्लान पारित कराया गया है, जिसका जमीनी असर अगले 5 वर्षों में दिखाई देगा।
खानपान: शुद्ध शाकाहारी, भजिया-चटनी से लेकर थाई फूड के शौकीन
बातचीत के दौरान उन्होंने अपने निजी जीवन के हल्के-फुल्के पहलू भी साझा किए। अमर अग्रवाल ने बताया कि वे पूरी तरह शाकाहारी हैं। उन्हें बिलासपुर की स्थानीय भजिया-चटनी जितनी पसंद है, उतना ही वे जापानी, इटालियन और थाई वेज फूड भी चाव से खाते हैं।
अभिषेक कुमार पाण्डेय
स्टेट हेड रिपोर्टर छत्तीसगढ़
Hamar pradesh CG
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