Monday, September 28 2026
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जमीन गई, मुआवजा अटका… 10 साल से सरकारी दफ्तरों की चौखट पर किसान! खसरा नंबर 883/19 और 883/20 की मुआवजा राशि के लिए भटक रहा परिवार, पीएमओ स्तर की जांच के बाद भी राहत नहीं मिलने का दावा

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जमीन गई, मुआवजा अटका… 10 साल से सरकारी दफ्तरों की चौखट पर किसान!  खसरा नंबर 883/19 और 883/20 की मुआवजा राशि के लिए भटक रहा परिवार, पीएमओ स्तर की जांच के बाद भी राहत नहीं मिलने का दावा

अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर छत्तीसगढ़ 

जमीन गई, मुआवजा अटका… 10 साल से सरकारी दफ्तरों की चौखट पर किसान!

खसरा नंबर 883/19 और 883/20 की मुआवजा राशि के लिए भटक रहा परिवार, पीएमओ स्तर की जांच के बाद भी राहत नहीं मिलने का दावा 

 

बिलासपुर। जमीन चली गई, लेकिन उसका मुआवजा आज तक नहीं मिला। एक-दो महीने या एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे 10 साल से एक किसान अपने हक की रकम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। आवेदन पर आवेदन, अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक और शिकायतों के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है। अब किसान ने कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचकर अपनी पीड़ा सामने रखी है।

 

मामला रतनपुर क्षेत्र की जमीन से जुड़ा है। किसान के मुताबिक खसरा नंबर 883/19 और 883/20 में उसकी हिस्सेदारी है। उसका आरोप है कि खसरा नंबर 883/19 की मुआवजा राशि अब तक नहीं मिली, जबकि खसरा नंबर 883/20 की करीब दो लाख रुपये की राशि भी लंबित है। किसान का कहना है कि इस रकम के लिए वह वर्षों से एसडीएम कार्यालय से लेकर कलेक्टर कार्यालय और संबंधित विभागीय अधिकारियों तक आवेदन दे चुका है, लेकिन हर बार उसे इंतजार ही मिला।

 

दस साल में फाइल आगे बढ़ी या किसान?

 

किसान की कहानी व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करती है। यदि जमीन का अधिग्रहण हो चुका है और मुआवजा निर्धारित है, तो आखिर भुगतान में इतनी लंबी देरी क्यों?

 

भूमि अर्जन से जुड़े मामलों में मुआवजा और उसके भुगतान की प्रक्रिया कानून से निर्धारित होती है। केंद्र का भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 भूमि अधिग्रहण, उचित मुआवजा और प्रभावित परिवारों के अधिकारों के लिए कानूनी ढांचा देता है। अधिनियम में मुआवजा निर्धारण और उसके भुगतान से जुड़े अलग-अलग प्रावधान भी हैं।

 

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि संबंधित जमीन के लिए मुआवजा देय है, तो दस साल बाद भी किसान अपने अधिकार के लिए भटकने को क्यों मजबूर है?

 

पीएमओ तक पहुंची शिकायत, फिर भी नहीं मिला न्याय!

 

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि किसान के अनुसार उसने अपनी समस्या को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ तक शिकायत की और जांच की प्रक्रिया भी हुई, लेकिन इसके बावजूद उसे अब तक लंबित मुआवजा नहीं मिला।

 

अगर शिकायत की जांच के बाद भी भुगतान नहीं हुआ है, तो अब यह सवाल संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी उठता है कि जांच में आखिर क्या सामने आया और उसके बाद किसान को राहत क्यों नहीं मिली?

 

कैंसर से जूझ रहे पिता, परिवार पर दोहरी मार

 

किसान की परेशानी केवल जमीन और मुआवजे तक सीमित नहीं है। उसके पिता कैंसर से पीड़ित बताए जा रहे हैं। परिवार पहले ही गंभीर बीमारी के इलाज के खर्च से जूझ रहा है और दूसरी ओर अपने ही हक के लिए वर्षों से सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना पड़ रहा है।

 

किसान का कहना है कि बार-बार कार्यालयों में जाना, आवेदन देना और अधिकारियों से गुहार लगाना उसके लिए अब बेहद मुश्किल हो चुका है। एक तरफ बीमार पिता का इलाज, दूसरी तरफ अटके हुए मुआवजे की चिंता—परिवार की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

 

पटवारी पर गंभीर आरोप, जमीन मांगने का दावा

 

मामले में किसान ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उसका दावा है कि संबंधित पटवारी द्वारा कथित तौर पर मुआवजे के बदले अलग से जमीन की मांग की गई। किसान के मुताबिक मांग पूरी नहीं करने के बाद उसका मामला और उलझ गया।

 

हालांकि यह आरोप किसान की शिकायत और उसके बयान पर आधारित है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और यदि आरोप गलत हैं तो स्थिति स्पष्ट हो, वहीं यदि कोई अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी तय की जा सके।

 

कलेक्टर जनदर्शन में छलका किसान का दर्द

 

इसी उम्मीद के साथ किसान कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचा। बताया गया है कि उसने कलेक्टर संजय अग्रवाल के सामने अपनी समस्या रखी। किसान अपनी बात बताते हुए भावुक हो गया और उसने वर्षों से चली आ रही परेशानी सामने रखी।

 

कलेक्टर ने शिकायत की जांच कराने और तथ्यों के आधार पर आगे कार्रवाई का भरोसा दिया है। अब देखना यह होगा कि जांच सिर्फ एक और सरकारी प्रक्रिया बनकर रह जाती है या वास्तव में किसान को उसके लंबित मुआवजे तक पहुंचाया जाता है।

 

अब प्रशासन से पांच बड़े सवाल

 

पहला सवाल: खसरा नंबर 883/19 की मुआवजा राशि अब तक क्यों लंबित है?

 

दूसरा सवाल: खसरा नंबर 883/20 की बताई जा रही करीब दो लाख रुपये की राशि का भुगतान क्यों नहीं हुआ?

 

तीसरा सवाल: यदि किसान ने वर्षों पहले आवेदन दिए थे, तो अब तक उनका अंतिम निराकरण क्यों नहीं हुआ?

 

चौथा सवाल: पीएमओ स्तर तक शिकायत पहुंचने और जांच के बाद भी किसान को राहत क्यों नहीं मिली?

 

पांचवां और सबसे गंभीर सवाल: पटवारी पर लगाए गए जमीन मांगने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी?

 

दस साल का इंतजार अब खत्म होगा या फिर एक और तारीख मिलेगी?

 

यह मामला केवल एक किसान के मुआवजे का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें एक आम नागरिक अपने अधिकार के लिए एक दशक तक सरकारी दफ्तरों की चौखट पर दस्तक देता रहे।

 

किसान के मुताबिक उसकी जमीन चली गई, लेकिन मुआवजा आज भी फाइलों में अटका हुआ है। पिता गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और परिवार आर्थिक परेशानी में है। इसके बावजूद किसान की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है।

 

अब निगाह प्रशासन की जांच पर है। क्या दस साल से लंबित मुआवजे का रास्ता खुलेगा? क्या कथित जमीन मांगने के आरोप की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या इस परिवार को आखिरकार उसका वैधानिक हक मिलेगा?

 

किसान की आंखों में अब भी उम्मीद है… लेकिन सवाल वही है—दस साल बाद आखिर कब मिलेगा उसका हक?

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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