अभिषेक कुमार पाण्डेय रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
विशेष रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ की माटी में दबा गोंडवाना का गौरवशाली अतीत — राजा रघुराज सिंह स्टेडियम और बूढ़ातालाब का अनकहा सच
रायपुर/बिलासपुर:
इतिहास के पन्नों पर अक्सर वही दर्ज होता है जो सत्ता के करीब रहा, लेकिन छत्तीसगढ़ की धरती पर गढ़े गए विशाल सरोवर और ऐतिहासिक धरोहरें आज भी गोंडवाना साम्राज्य की समृद्ध विरासत की गवाही दे रही हैं। गढ़-मंडला के अधीन रहे छत्तीसगढ़ के प्रमुख अंचलों में पंडरिया-कवर्धा के जगत राजवंश और रायपुर के बूढ़ातालाब का इतिहास आज जनमानस के सामने अपनी वास्तविक पहचान की मांग कर रहा है।
1. बिलासपुर का राजा रघुराज सिंह स्टेडियम: पंडरिया राजघराने का खेल इतिहास
बिलासपुर शहर के बीचों-बीच स्थित क्रिकेट स्टेडियम केवल एक खेल मैदान नहीं, बल्कि पंडरिया रियासत के राजा रघुराज सिंह जगत की ऐतिहासिक पहचान है।
* राजवंश का आधार: पंडरिया जमींदारी कभी कलचुरी शासकों के अधीन नहीं रही, बल्कि गढ़-मंडला के मड़ावी गोंड राजाओं के सीधे नियंत्रण में थी। 13वीं सदी के पूर्व जब लोधी शासकों ने गढ़-मंडला की संप्रभुता की अनदेखी शुरू की, तब नागवंशी गोंड राजाओं ने अपने पराक्रमी सेनापति राय सिंह जगत को जिम्मेदारी सौंपी, जिनका परिवार आगे चलकर पंडरिया और कवर्धा में स्थापित हुआ।
* मैदान का स्वर्णिम काल: राजा रघुराज सिंह (शासनकाल 1929 तक) के नाम पर बने इस स्टेडियम ने 1978 से 1990 तक प्रतिष्ठित रणजी ट्रॉफी मैचों की मेजबानी की।
* चार दशक का इंतजार खत्म: इस ऐतिहासिक मैदान में लगभग 40 वर्षों से फ्लड लाइट्स की मांग की जा रही थी, जिसे अब हाई-मास्ट लाइटों की स्थापना के साथ आधुनिक स्वरूप दिया गया है।
> जगत राजवंश के प्रमुख स्तंभ:
> * रानी मानकुमारी देवी जगत: सारंगढ़ राजघराने से संबंध; 1929 में पति के उपरांत जमींदारी संभाली और 1938 में रानी की आधिकारिक उपाधि प्राप्त की।
> * महाराज विश्वराज प्रताप सिंह जगत: कवर्धा राज परिवार के प्रतिष्ठित बड़े महाराज।
> * योगेश्वर राज सिंह जगत (जन्म 1967): राज गोंड ठाकुर नागवंशी वंश के वारिस, राजकुमार कॉलेज (रायपुर) के पूर्व छात्र व सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व।
>
2. रायपुर का 'बूढ़ातालाब': श्रम, सैन्य रणनीति और बड़ादेव की आस्था
राजधानी रायपुर का हृदय स्थल कहे जाने वाले तालाब की नींव किसी आधुनिक योजना का परिणाम नहीं, बल्कि 13वीं-14वीं सदी में गोंड राजा रायसिंह जगत की दूरगामी सैन्य और सामाजिक सोच थी।
| ऐतिहासिक तथ्य | विवरण |
|---|---|
| निर्माता | गोंड राजा रायसिंह जगत (गढ़-मंडला सेनापति) |
| श्रम शक्ति | 3,000 महिलाएं और 4,000 पुरुष (कुल 7,000 श्रमसाधक) |
| निर्माण अवधि | लगभग 6 माह का निरंतर श्रम |
| कुल क्षेत्रफल | 12 एकड़ में विस्तृत जल संरचना |
| मूल उद्देश्य | गोंडवाना सेना की जल आपूर्ति व जन-कल्याण |
* नामकरण का मूल आधार: तालाब के मध्य में गोंड जनजाति के आराध्य 'बूढ़ादेव' (बड़ादेव) की स्थापना की गई थी। 'बूढ़ादेव' शब्द विशुद्ध रूप से गोंडी परंपरा और आस्था का प्रतीक है, जिसके आधार पर इस जलाशय और आसपास के पूरे इलाके को 'बूढ़ापारा' नाम मिला।
* पहचान का संघर्ष: वर्तमान में इसे 'स्वामी विवेकानंद सरोवर' के रूप में प्रचारित किए जाने को लेकर इतिहास के जानकारों और गोंडवाना समाज का स्पष्ट मत है कि आधुनिक नामकरण के कारण इस स्थल के 700 साल पुराने मूल गोंडी इतिहास और जनजातीय योगदान को हाशिए पर धकेला जा रहा है।
धरोहर और वर्तमान स्थिति
* स्थान: बूढ़ातालाब (बूढ़ापारा), रायपुर – 492001
* आराध्य स्थल: आदिशक्ति बूढ़ा देव महादेव
* व्यवस्था: आदिशक्ति बूढ़ा देव सेवा समिति
* धार्मिक परंपरा: प्रत्येक मासिक शिवरात्रि पर यहां आदिशक्ति बूढ़ादेव का विशेष अभिषेक एवं अनुष्ठान आयोजित होता है।
रायपुर से लेकर बिलासपुर और कवर्धा तक फैली गोंडवाना कालीन संरचनाएं यह साबित करती हैं कि छत्तीसगढ़ का स्थापत्य और इतिहास गोंड राजाओं के पराक्रम के बिना अधूरा है।
हमर प्रदेश सी जी
Comments (0)
Leave a Comment
No comments yet. Be the first to share your thoughts!