विशेष खोजी रिपोर्ट: ‘विकास’ के नाम पर कीचड़ का दलदल!
कैबिनेट मंत्री के गढ़ में PMGSY का ‘सफेद हाथी’: मिट्टी डालकर गायब हुआ ठेकेदार, बारिश में धंसा चेरा; क्या 6 बार के विधायक के रसूख से बेखौफ है सिस्टम?

मई-जून में आधी-अधूरी मिट्टी, जुलाई-अगस्त में दलदल! चेरा के खेतों में घुस रहा कीचड़, फसलें चौपट।
सवाल बड़ा—कागजों में चमचमाती सड़क, जमीन पर खौफनाक गड्ढे; आखिर निगरानी विभाग ने किसके इशारे पर बंद की आंखें?

स्थान: बलरामपुर-रामानुजगंज / चेरा
डेस्क रिपोर्ट: जनहित खोजी सेल
1. ज़मीनी हकीकत: सड़क नहीं, यह ग्रामीणों के लिए ‘दलदल का जाल’ है

रामानुजगंज विधानसभा का ग्राम पंचायत चेरा। सरकारी रिकॉर्ड और आंकड़ों में दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत यह सड़क ग्रामीणों के लिए विकास का मुख्य द्वार बनेगी। लेकिन आज की जमीनी तस्वीर सरकारी दावों का उपहास उड़ा रही है।
मौके की स्थिति यह है कि मई-जून के महीनों में आनन-फानन में कच्ची मिट्टी सड़क पर डलवा दी गई। इसके बाद न तो निर्धारित मोटाई में मुरुमीकरण हुआ, न रोलिंग, और न ही अगला तकनीकी चरण पूरा किया गया। नतीजा? पहली ही बारिश ने सरकारी सिस्टम की पोल खोल दी। भारी वाहनों के पहियों से बने गहरे खड्डे, बहती मिट्टी और घुटनों तक कीचड़ ने 350 से अधिक परिवारों और लगभग 1,500 की आबादी का रास्ता रोक दिया है।

2. अन्नदाता पर दोहरी मार: खेतों में पहुंचा दलदल, फसलें बर्बाद होने की कगार पर
यह सिर्फ आवागमन ठप होने का मामला नहीं है, बल्कि किसानों की आजीविका पर सीधा प्रहार है। सड़क किनारे स्थित कृषि भूमि में ठेकेदार द्वारा अनियोजित ढंग से डाली गई मिट्टी कट-कटकर खेतों में जमा हो रही है। ग्रामीणों का कहना है:
> "अगर समय रहते मुरुम डालकर बेस मजबूत किया जाता, तो यह मिट्टी हमारे धान के खेतों में नहीं बहती। अब न सड़क बची, न खेत सुरक्षित रहे। हमारी मेहनत पर ठेकेदार की मनमानी भारी पड़ रही है।"
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मरीजों को अस्पताल ले जाना हो, बच्चों को स्कूल भेजना हो या बुजुर्गों का निकलना—चेरा आज विकास की नहीं, बुनियादी आवागमन की भीख मांगने को मजबूर है।
3. सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न: 6 बार के विधायक और कैबिनेट मंत्री के इलाके में इतनी बेपरवाही की हिम्मत किसकी?
रामानुजगंज कोई सामान्य विधानसभा सीट नहीं है। इसका प्रतिनिधित्व वरिष्ठ भाजपा नेता और प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम करते हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड गवाह है कि नेताम 1990 से लेकर अब तक 6 बार विधायक चुने जा चुके हैं और राज्यसभा सदस्य के रूप में भी दिल्ली तक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

जब क्षेत्र का जनप्रतिनिधि इतना कद्दावर और सत्ता के शीर्ष पर हो, तब यह सवाल उठना लाजिमी है:
* क्या ठेकेदार और विभागीय इंजीनियरों को किसी का डर नहीं?
* तकनीकी मापदंडों का खुला उल्लंघन कर मिट्टी डालकर काम छोड़ देने की इजाजत किसने दी?
* क्या विभागीय अधिकारियों ने मौके का सत्यापन किए बिना ही कागजों पर काम आगे बढ़ा दिया?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा गरम है कि क्या ठेकेदार को किसी राजनीतिक रसूख या प्रशासनिक लापरवाही का 'अप्रत्यक्ष संरक्षण' प्राप्त है? यदि नहीं, तो जनता की मांग है कि माननीय मंत्री जी स्वयं इस मामले को संज्ञान में लें और निष्पक्ष तकनीकी ऑडिट करवाकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई कराएं।

4. इतिहास से सबक: क्या चेरा में फिर दोहराया जा रहा है पुराना खेल?
यह संदेह इसलिए भी गहराता है क्योंकि चेरा क्षेत्र में सड़क निर्माण का पुराना रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में रहा है। पूर्व में आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में फुलीडुमर-चेरा-सलवाही मार्ग में मिट्टी कार्य की माप और भुगतान में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं (लगभग ₹28.08 लाख के अतिरिक्त भुगतान) का पर्दाफाश हुआ था।

यद्यपि वह एक अलग और पुराना ऑडिट प्रकरण था, लेकिन उससे यह स्पष्ट सीख मिलती है कि इस बेल्ट में सड़क निर्माण कार्यों की वित्तीय और भौतिक निगरानी बेहद संदेहास्पद रही है। क्या वर्तमान पैकेज में भी उसी ढर्रे पर काम चल रहा है?
5. जनता का अल्टीमेटम: 'सड़क फाइल' सार्वजनिक करे प्रशासन
कागजी खानापूर्ति और बंद कमरों की समीक्षाओं से तंग आ चुके ग्रामीणों ने अब प्रशासन और PMGSY विभाग के सामने 6 सूत्रीय सीधी मांग रखी है:
* पैकेज और अनुबंध का खुलासा: इस सड़क का टेंडर पैकेज नंबर, स्वीकृत राशि और कार्यादेश की तारीख सार्वजनिक की जाए।
* ठेकेदार की जवाबदेही: निर्माण एजेंसी का नाम और कार्य पूर्ण करने की अंतिम समय-सीमा का बोर्ड मौके पर लगाया जाए।
* एम-बुक (M-Book) और भुगतान जांच: अब तक ठेकेदार को किए गए भुगतान और मापी गई कार्य मात्रा की स्वतंत्र तकनीकी टीम से जांच हो।

* गुणवत्ता नियंत्रण रिपोर्ट: क्या मिट्टी डालने के बाद तय मानकों के अनुरूप लैब टेस्टिंग और फील्ड इंस्पेक्शन हुआ?
* अधिकारियों पर कार्रवाई: जिस उप-अभियंता (Sub-Engineer) और कार्यपालन अभियंता (EE) के जिम्मे निगरानी थी, उन पर कारण बताओ नोटिस जारी हो।
* तत्काल बहाली: बारिश के बीच तुरंत अस्थायी गिट्टी/मुरुम डालकर आवागमन बहाल किया जाए तथा किसानों के नुकसान की भरपाई की जाए।
निष्कर्ष: भाषणों से नहीं, डामर से जुड़ते हैं गांव!
सरकार की ‘सुशासन’ और ‘अंतिम व्यक्ति तक विकास’ की नीति तब दम तोड़ती नजर आती है जब सत्ताधारी दल के कद्दावर मंत्री के गृह क्षेत्र में ही जनता कीचड़ में घिसटने को मजबूर हो।
चेरा की सड़क अब सिर्फ डामर और गिट्टी का टुकड़ा नहीं रही, यह प्रशासनिक जवाबदेही, ठेकेदारी सिंडिकेट और जनप्रतिनिधि की साख की परीक्षा बन चुकी है।
अब देखना यह है कि मंत्री रामविचार नेताम और जिला प्रशासन इस दलदल पर संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई की नजीर पेश करते हैं या चेरा की जनता यूं ही वादों के कीचड़ में फंसी रहेगी?

रिपोर्ट: पंकज कुमार यादव
ब्लॉक रिपोर्टर, हमर प्रदेश छत्तीसगढ़
पार्ट 1
(विशेष सहयोग अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर)
हमर प्रदेश सी जी
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