क़ानूनन तलाक़ साबित नहीं, तो आर्य समाज में हुई दूसरी शादी भी 'अमान्य': हाईकोर्ट का कड़ा फ़ैसला
"सिर्फ़ सामाजिक तलाक़ का दावा क़ानून की नज़र में मान्य नहीं"; हिंदू विवाह अधिनियम के तहत जीवित पति/पत्नी के रहते किया गया दूसरा विवाह शून्य घोषित
लीगल रिपोर्टर | बिलासपुर
क़ानूनन तलाक़ लिए बिना की गई दूसरी शादी को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक नज़ीर पेश करने वाला कड़ा फ़ैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक पूर्व पति से विधिसम्मत तरीक़े से तलाक़ साबित नहीं किया जाता, तब तक किया गया दूसरा विवाह क़ानून की नज़र में पूरी तरह अमान्य और शून्य (Void) माना जाएगा।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश पर मुहर लगा दी है, जिसमें एक महिला के दूसरे विवाह को शून्य घोषित किया गया था।
धोखे की बुनियाद: पहली शादी छिपाई, आर्य समाज में रचाया दूसरा ब्याह
मामला बिलासपुर के गांधी चौक क्षेत्र का है, जहाँ एक व्यक्ति ने 3 नवंबर 2015 को आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज़ों के साथ महिला से शादी की थी। विवाह के कुछ समय बाद पति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई, जब उसे पता चला कि:
* महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका पहला पति जीवित था।
* उसने बिना किसी क़ानूनी तलाक़ के अपनी पहली शादी की बात छिपाई और धोखे से दूसरा ब्याह रचा लिया।
धोखाधड़ी सामने आने के बाद पीड़ित पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 और 12(1) के तहत विवाह को शून्य घोषित कराने के लिए बिलासपुर फैमिली कोर्ट की शरण ली। फैमिली कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर शादी को अमान्य क़रार दिया, जिसके ख़िलाफ़ महिला ने हाईकोर्ट में अपील दाख़िल की थी।
कोर्ट में दावों की खुली पोल: भरण-पोषण के पुराने दस्तावेज़ों ने बिगाड़ा खेल
हाईकोर्ट में अपील के दौरान महिला ने पहले यह तर्क देकर बचने की कोशिश की कि उसकी पहले किसी से शादी ही नहीं हुई थी।
हालांकि, अदालत के रिकॉर्ड खंगालने पर महिला के दावों की हवा निकल गई। पूर्व में महिला द्वारा भरण-पोषण के लिए दायर किए गए मामलों के पुराने दस्तावेज़ों से साफ़ हो गया कि वह पहले से विवाहित थी। इसके बाद महिला ने अपने बचाव में 'सामाजिक रीति-रिवाज़ से तलाक़' होने की दलील पेश की।

हाईकोर्ट की दो-टूक: रीति-रिवाज़ से तलाक़ का दावा है, तो गवाह और सबूत लाएं
डिवीजन बेंच ने मौखिक दलीलों को सिरे से ख़ारिज करते हुए व्यवस्था दी:
* मौखिक दावा अमान्य: यदि कोई पक्षकार सामाजिक रीति-रिवाज़ या प्रथा के आधार पर तलाक़ का दावा करता है, तो यह केवल मुंहज़बानी नहीं चल सकता। उसे पुख़्ता गवाहों और ठोस दस्तावेज़ी साक्ष्यों से साबित करना होगा।
* पहली शादी क़ानूनी रूप से अस्तित्व में थी: महिला अदालत में यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि उसका पहले पति से वैध तलाक़ हुआ था। ऐसे में 3 नवंबर 2015 को दूसरा विवाह करते समय उसकी पहली शादी क़ानूनन जीवित मानी जाएगी।
* धारा 11 के तहत विवाह शून्य: अदालत ने दो-टूक कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के तहत जीवित जीवनसाथी के रहते किया गया कोई भी दूसरा विवाह शुरुआत से ही शून्य (अस्तित्वहीन) है।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
हमर प्रदेश सी जी
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