अभिषेक कुमार पाण्डेय ,स्टेट हेड रिपोर्टर छत्तीसगढ़
इश्क, फरेब और डीएनए का सच: मांग में सिंदूर भरकर मुकरा दुकानदार, हाई कोर्ट ने कसा शिकंजा— 'खून तुम्हारा है तो बच्चे का खर्च भी तुम्हीं भरोगे'
बिलासपुर (विशेष रिपोर्ट):
झूठे वादों, बंद कमरों की हकीकत और अदालत के गलियारों से होकर गुजरी यह कहानी किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं है। प्यार का झांसा देकर एक मासूम को दुनिया में लाने के बाद अपनी जिम्मेदारी से मुकरने वाले पिता को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आईना दिखा दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने दो-टूक फैसला सुनाते हुए कहा कि जब डीएनए रिपोर्ट में पितृत्व साबित हो चुका है, तो कोई भी शख्स अपने बायोलॉजिकल बच्चे के भरण-पोषण से भाग नहीं सकता। अदालत ने सीपत निवासी पिता को आदेश दिया है कि वह 3 साल के मासूम को हर महीने 5,000 रुपये गुजारा भत्ता दे।
प्यार का जाल, सिंदूर की कसमें और फिर धोखा
मामले की शुरुआत बिलासपुर के तिफरा इलाके से होती है। पीड़िता एक दुकान में सेल्सगर्ल के रूप में काम करती थी। इसी दौरान उसकी पहचान सीपत चौक के पास दुकान चलाने वाले एक युवक से हुई। धीरे-धीरे नजदीकियां बढ़ीं और प्यार का ऐसा खेल शुरू हुआ जिसका अंत अदालत में होना तय था।
* मांग भरकर पत्नी माना: महिला का गंभीर आरोप है कि युवक ने उसकी मांग भरकर उसे पत्नी का दर्जा दिया, भरोसे में लिया और शारीरिक संबंध बनाए।
* बच्चा पैदा होते ही पल्ला झाड़ा: 16 जून 2022 को जब एक मासूम बेटे की किलकारी गूंजी, तो युवक के तेवर अचानक बदल गए। उसने बच्चे को अपना मानने से साफ इनकार कर दिया।
* खुला शादीशुदा होने का राज: महिला को बाद में पता चला कि जिसे वह अपना हमसफर समझ बैठी थी, वह पहले से ही शादीशुदा है और दो बच्चों का पिता बनकर खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रहा है।
थाने के चक्कर और फैमिली कोर्ट का झटका
जब धोखे का पर्दाफाश हुआ तो मामला सरकंडा और सिरगिट्टी थाने पहुंचा। महिला ने दुष्कर्म और अन्य धाराओं में केस दर्ज करवाए। इसके बाद महिला ने बच्चे के हक के लिए फैमिली कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की अर्जी लगाई।
* युवक का पलटवार: युवक ने खुद को निर्दोष बताते हुए दलील दी कि महिला पढ़ी-लिखी और बालिग है, उसे उसके विवाहित होने की पूरी जानकारी थी। शादी से इनकार करने पर उस पर दबाव बनाने के लिए झूठी शिकायतें दर्ज कराई गईं।
* निचली अदालत की ना: 29 दिसंबर 2025 को फैमिली कोर्ट ने महिला और बच्चे दोनों की भरण-पोषण की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। इसके खिलाफ महिला ने हार न मानते हुए हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल किया।
साइंस ने उगला सच, हाई कोर्ट ने तय की जिम्मेदारी
हाई कोर्ट में जब मामला पहुंचा तो पुलिस जांच में कराई गई डीएनए (DNA) रिपोर्ट सबसे बड़ा कानूनी अस्त्र साबित हुई। डीएनए टेस्ट ने वैज्ञानिक रूप से साफ कर दिया कि बच्चे का बायोलॉजिकल पिता वही युवक है। इसके अलावा सिरगिट्टी थाने में हुए पुराने समझौते में भी युवक ने बच्चे को अपने पास रखने की बात कबूल की थी।
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए एक बेहद अहम कानूनी नजीर पेश की:
* मां और बच्चे का दावा अलग: कोर्ट ने माना कि महिला को गुजारा भत्ता न देने का फैमिली कोर्ट का फैसला तथ्यों के आधार पर सही था, लेकिन एक मासूम बच्चे के अधिकार को मां के विवाद से नहीं जोड़ा जा सकता।
* 1 सितंबर 2026 से भुगतान: अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि पिता होने का वैज्ञानिक प्रमाण मिलने के बाद भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि पिता को 1 सितंबर 2026 से हर महीने अनिवार्य रूप से 5,000 रुपये बच्चे के लालन-पालन के लिए देने होंगे।
Hamar pradesh CG
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