आयोग अदालत नहीं, सिफारिशी मंच हैं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फिर खींची लक्ष्मण रेखा; महिला आयोग के बाद अब एक और आयोग के फैसले पर चलाई कैंची
बिलासपुर:
"सिफारिश करने का अधिकार न्यायपालिका बनने का लाइसेंस नहीं देता।" छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक बार फिर प्रशासनिक व संवैधानिक आयोगों को उनकी संवैधानिक सीमाओं की याद दिलाते हुए कड़ा रुख अपनाया है। राज्य महिला आयोग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पारित किए गए आदेशों पर रोक लगाने के बाद, अब हाई कोर्ट ने एक अन्य आयोग द्वारा जारी गैर-कानूनी आदेश पर कैंची चला दी है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आयोगों को अपनी निर्धारित परिधि में रहकर काम करना होगा; वे खुद को समानांतर न्यायिक अदालत (Courts of Law) नहीं समझ सकते।
क्या है मामला और क्यों चला हाई कोर्ट का डंडा?
प्रकरण में आयोग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए ऐसा आदेश या निर्देश पारित कर दिया गया था, जो केवल सक्षम न्यायालय या स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही दिया जा सकता था। प्रभावित पक्ष ने जब इस आदेश को बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी, तो अदालत ने आयोग की कार्यप्रणाली और अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) पर गंभीर सवाल खड़े किए।
याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ पाया कि आयोग ने अपने 'अन्वेषण और सिफारिश' के दायरे को लांघकर 'न्यायिक और दंडात्मक आदेश' देने की कोशिश की, जो कानूनन पूरी तरह शून्य और असंवैधानिक है।
हाई कोर्ट की दो-टूक: 'लक्ष्मण रेखा' याद रखें आयोग
हाई कोर्ट ने इस आदेश को निरस्त/बाधित करते हुए व्यवस्था दी कि:
* आयोग अदालतें नहीं हैं: किसी भी आयोग (चाहे वह महिला आयोग हो, मानवाधिकार आयोग हो या कोई अन्य सांविधिक मंच) की मूल भूमिका शिकायतें सुनना, जांच करना और शासन या सक्षम प्राधिकारी को अपनी सिफारिशें भेजना है।
* अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं: आयोग सिविल कोर्ट या क्रिमिनल कोर्ट की तरह पक्षकारों पर बाध्यकारी आदेश थोपने, सीधे दंड तय करने या न्यायिक फैसले सुनाने का अधिकार नहीं रखते।
* प्रक्रिया का पालन अनिवार्य: यदि कोई आयोग कानून द्वारा प्रदत्त सीमाओं से बाहर जाकर मनमाना आदेश देता है, तो न्यायपालिका उस पर हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी।
मनमानी कार्यशैली पर करारा तमाचा
हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ में विभिन्न आयोगों द्वारा अपनी शक्तियों से परे जाकर सीधे आदेश जारी करने के मामले लगातार बढ़े हैं। कभी संपत्ति विवादों में सीधे हस्तक्षेप, तो कभी प्रशासनिक अधिकारों में दखल। हाई कोर्ट का यह ताजा फैसला उन सभी आयोगों के लिए स्पष्ट संदेश है जो सिफारिशी संस्था होने के बावजूद खुद को पूर्ण अदालत समझने की भूल कर रहे हैं।
अदालत के इस कड़े रुख से यह तय हो गया है कि आयोगों की मनमानी पर अब कानूनी अंकुश पूरी मजबूती से कसा जाएगा।
अभिषेक कुमार पाण्डेय स्टेट हेड रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़
हमर प्रदेश सी जी
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