180 दिन, अधूरी रिपोर्ट और एक बर्खास्तगी: लालखदान रेल हादसे में महिला ऑपरेटर पर गिरी गाज, लेकिन रेलवे के बड़े चेहरों की जवाबदेही कब?
लालखदान रेल हादसे के 6 महीने बाद भी कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (CRS) की 'फाइनल रिपोर्ट' फाइलों से बाहर नहीं आ सकी, लेकिन प्राथमिक जांच के आधार पर महिला ऑपरेटर को नौकरी से बेदखल कर दिया गया। क्या सिस्टम ने अपनी तकनीकी नाकामी छुपाने के लिए सबसे कमजोर कड़ी को निशाना बनाया?
बिलासपुर।

पटरियों पर जब लोहे के भारी पहिये बेपटरी होते हैं, तो उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देती है। लालखदान रेल हादसे के वक्त भी यही हुआ था—बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुईं, हाई-लेवल जांच बैठाई गई और संरक्षा के नाम पर कड़े कदम उठाने के दावे किए गए। लेकिन हादसे के ठीक 180 दिन (छह महीने) बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने रेलवे के समूचे जांच तंत्र और कार्यप्रणाली को सवालों के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
रेलवे ने कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (CRS) की महज शुरुआती (Preliminary) रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई का चाबुक चलाते हुए ड्यूटी पर तैनात महिला ऑपरेटर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस हादसे की वजह से करोड़ों का नुकसान हुआ और यात्रियों की जान पर बन आई थी, उसकी ‘अंतिम जांच रिपोर्ट’ (Final Report) 6 महीने बीत जाने के बाद भी सार्वजनिक नहीं हो पाई है।
जांच अधूरी, तो सजा पूरी कैसे? उठ रहे हैं गंभीर सवाल
रेलवे के जानकारों और कर्मचारी यूनियनों के बीच इस कार्रवाई को लेकर गहरा असंतोष है। सवाल यह उठ रहा है कि जब तक तकनीकी जांच अपने अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची, तब तक सिर्फ एक ग्राउंड-लेवल कर्मचारी को दोषी मानकर इतनी बड़ी सजा कैसे सुनाई जा सकती है?
* क्या तकनीकी विफलता को मानवीय भूल का चोला पहनाया गया?
रेलवे का संचालन सिर्फ एक ऑपरेटर के बटन दबाने पर निर्भर नहीं करता। इसमें आधुनिक इंटरलॉकिंग, सिगनलिंग, ट्रैक सर्किट और बैकअप सुरक्षा प्रणालियों का एक पूरा जाल होता है। अगर सिस्टम में तकनीकी खराबी (Fail-Safe Mechanism की विफलता) थी, तो उसका ठीकरा सिर्फ एक महिला ऑपरेटर के सिर पर क्यों फोड़ा गया?
* प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों की अनदेखी:
किसी भी निष्पक्ष जांच का नियम है कि आरोपी को अपनी बात रखने और अंतिम जांच रिपोर्ट के हर बिंदु की समीक्षा के बाद ही फैसला दिया जाए। अंतिम रिपोर्ट के बिना सीधे बर्खास्तगी का फरमान यह संदेश देता है कि उच्च अधिकारियों ने खुद को जांच की आंच से बचाने के लिए आनन-फानन में एक ‘बलि का बकरा’ तय कर दिया।
180 दिन की चुप्पी: आखिर फाइनल रिपोर्ट में क्या छुपा रहा है रेलवे?
हादसे के बाद CRS ने ग्राउंड इंस्पेक्शन किया, डेटा लॉगर खंगाले और संबंधित कर्मचारियों के बयान दर्ज किए। आधुनिक तकनीकी संसाधनों और हाई-स्पीड डेटा एनालिसिस के दौर में एक रेल हादसे की अंतिम रिपोर्ट आने में 180 दिन से ज्यादा का वक्त लगना अपने आप में कई संदेह पैदा करता है:
* क्या रिपोर्ट में किसी बड़े अफसर या तकनीकी विंग की चूक है? अक्सर देखा गया है कि जब जांच का दायरा बड़े नीति-निर्माताओं या मेंटेनेंस विंग के शीर्ष अधिकारियों तक पहुंचता है, तो रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।
* सिस्टम का बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर कितना फिट था? क्या उस दिन पटरियों और सिग्नलों का मेंटेनेंस तय मानकों के अनुसार था? इस सवाल का जवाब अंतिम रिपोर्ट में ही बंद है।
महिला कर्मचारी ही क्यों बनी आसान शिकार?
रेलवे में सुरक्षा और परिचालन से जुड़ी जिम्मेदारियां पदानुक्रम (Hierarchy) में बंटी होती हैं। स्टेशन मास्टर, कंट्रोलर, सेक्शन इंजीनियर से लेकर वरिष्ठ मंडल स्तर के अधिकारी तक सुरक्षा श्रृंखला का हिस्सा होते हैं।
मगर लालखदान हादसे में गाज गिरी सबसे निचले पायदान पर बैठी महिला ऑपरेटर पर। साथी कर्मचारियों का दबी जुबान में कहना है कि ग्राउंड स्टाफ के पास न तो कोई बड़ा राजनीतिक रसूख होता है और न ही अपनी पैरवी के लिए बड़े संसाधन, इसलिए रेलवे प्रशासन के लिए ऐसे कर्मियों पर कार्रवाई करके अपनी ‘त्वरित सक्रियता’ दिखाना सबसे आसान विकल्प बन जाता है।
सिस्टम को देने होंगे सीधे जवाब

लालखदान रेल हादसा केवल एक ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का परीक्षण है जो हर दिन लाखों यात्रियों की जान की जिम्मेदारी संभालता है।

* क्या रेलवे प्रशासन 180 दिनों बाद भी उस अंतिम रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की हिम्मत जुटाएगा?

* क्या बर्खास्त महिला ऑपरेटर को अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा और निष्पक्ष मौका मिलेगा?
* या फिर लालखदान की फाइल भी पटरियों की पुरानी धूल में दबकर इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएगी?
जब तक सिस्टम में बैठे बड़े जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक केवल छोटे कर्मचारियों की बर्खास्तगी से न तो रेल पटरियां सुरक्षित होंगी और न ही भविष्य के हादसों को टाला जा सकेगा।
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