Tuesday, September 29 2026
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16वीं सदी के स्वयंभू चतुर्भुज गणेश...गढ़डोंगरी मंदिर से जुड़ी आस्था की अनोखी कहानी,आरती के समय जंगल से पहुंचते हैं भालू..!

State Head - Kishor
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16वीं सदी के स्वयंभू चतुर्भुज गणेश...गढ़डोंगरी मंदिर से जुड़ी आस्था की अनोखी कहानी,आरती के समय जंगल से पहुंचते हैं भालू..!

✍️जय किशन साहू हमर प्रदेश छत्तीसगढ़ स्टेट 

धमतरी/नगरी। गणेश चतुर्थी का पर्व आते ही धमतरी जिले में भक्ति और उल्लास का माहौल बन जाता है। शहर से लेकर गांवों तक ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे गूंजते हैं। इसी आस्था के बीच नगरी क्षेत्र का गढ़डोंगरी गांव अपनी एक अनोखी धार्मिक मान्यता के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां भगवान गणेश की स्वयंभू चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है, जिसे स्थानीय लोग करीब 16वीं सदी का मानते हैं।

 

नगरी ब्लॉक मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित गढ़डोंगरी में गणेश चतुर्थी का पर्व विशेष धार्मिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। हर वर्ष यहां ज्योत प्रज्ज्वलित की जाती है और आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु भगवान गणेश के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

रात की आरती और जंगली भालुओं से जुड़ी मान्यता

 

गढ़डोंगरी मंदिर की सबसे चर्चित मान्यता यहां होने वाली रात की आरती से जुड़ी है। स्थानीय लोगों के अनुसार, आरती के समय जंगल से दो जंगली भालू मंदिर परिसर के आसपास पहुंचते हैं। मान्यता है कि वे मंदिर में मिलने वाला प्रसाद ग्रहण करते हैं और इसके बाद शांतिपूर्वक वापस जंगल की ओर चले जाते हैं।

 

स्थानीय श्रद्धालु इसे भगवान गणेश की कृपा और मंदिर की विशेष धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, जंगली भालुओं के व्यवहार से जुड़ी ऐसी घटनाओं को स्थानीय मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

 

पत्थर से जुड़ी है स्वयंभू गणेश प्रतिमा की कहानी

 

स्थानीय मान्यता के अनुसार, गढ़डोंगरी में भगवान गणेश की प्रतिमा की खोज कई सदियों पहले क्षेत्र के मालगुजार ठाकुर वनसिंह ने की थी। बताया जाता है कि जंगल में शिकार के दौरान उनका पैर एक पत्थर से टकराया और वे घायल हो गए। इसके बाद उन्हें स्वप्न में भगवान गणेश के दर्शन हुए और उन्हें बताया गया कि जिस पत्थर से वे टकराए हैं, उसमें गणेश का वास है।

 

इसके बाद उस स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू हुई और धीरे-धीरे यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।

 

सांप और मेंढक के साथ रहने की भी है मान्यता

 

मंदिर परिसर में स्थित आम के पेड़ के नीचे बने एक बिल को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अनोखी मान्यता है। ग्रामीणों के अनुसार, यहां सांप और मेंढक एक ही स्थान पर रहते हैं और एक-दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचाते। श्रद्धालु इसे भगवान गणेश की विशेष कृपा से जोड़कर देखते हैं।

 

मंदिर के समीप बहने वाली जलधारा भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। स्थानीय मान्यता है कि जलधारा भगवान गणेश के चरणों से होकर कुंड में गिरती है। भक्त इस जल को पवित्र मानकर अपने साथ घर ले जाते हैं।

 

पेड़ के नीचे से भव्य मंदिर तक का सफर

 

स्थानीय लोगों के अनुसार, शुरुआती दौर में भगवान गणेश की प्रतिमा पेड़ के नीचे विराजमान थी। श्रद्धालु एक छोटे से झोपड़ीनुमा बरामदे में पूजा-अर्चना करते थे। समय के साथ ग्रामीणों और समिति के प्रयासों से मंदिर का विस्तार हुआ।

 

 

आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम

 

गढ़डोंगरी का स्वयंभू गणेश मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि जंगल और प्रकृति से घिरे होने के कारण अपने अलग वातावरण के लिए भी जाना जाता है। यहां भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमा, जलधारा, स्थानीय परंपराएं और वन्यजीवों से जुड़ी मान्यताएं इस स्थान को अलग पहचान देती हैं।

 

गणेश चतुर्थी के दौरान जब मंदिर परिसर ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारों से गूंजता है, तो गढ़डोंगरी में आस्था और प्रकृति का यह संगम देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।

 

इसी अनोखी धार्मिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के कारण गढ़डोंगरी का गणेश मंदिर धमतरी जिले के प्रमुख आस्था स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है।

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Contributing writer at THE NEWS HUB. Covering the latest developments in खबरे काम की.

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